मोदी सरकार का बड़ा फैसला- देश की मेडिकल शिक्षा की दिशा और दशा को नियंत्रित करने वाले राष्ट्रीय आयुर्विज्ञान आयोग (नेशनल मेडिकल कमीशन-एनएमसी) विधेयक पर संसद ने मुहर लगा दिया गया

मोदी सरकार का बड़ा फैसला- देश की मेडिकल शिक्षा की दिशा और दशा को नियंत्रित करने वाले राष्ट्रीय आयुर्विज्ञान आयोग (नेशनल मेडिकल कमीशन-एनएमसी) विधेयक पर संसद ने मुहर लगा दिया गया
न्यू दिल्ली | इंडिया बेस्ट न्यूज़ | पुरुषोत्तम दुबे
भविष्य में हमारे देश की मेडिकल शिक्षा की दिशा और दशा को नियंत्रित करने वाले राष्ट्रीय आयुर्विज्ञान आयोग (नेशनल मेडिकल कमीशन-एनएमसी) विधेयक पर संसद ने मुहर लगा दिया गया है
राज्यसभा पिछले हफ्ते ही इस विधेयक पर मुहर लगा चुकी है। कांग्रेस, तृणमूल कांग्रेस और द्रमुक के वाकआउट के बीच सोमवार को लोकसभा ने भी इस पर मुहर लगा दी।
एनएमसी फिलहाल देश में मेडिकल शिक्षा को नियंत्रित कर रहे बोर्ड ऑफ गवर्नर्स (बीओजी) की जगह लेगा। पिछले साल सरकार ने भ्रष्टाचार के आरोपों में घिरी और मेडिकल शिक्षा के विस्तार में रोड़ा बन चुकी भारतीय चिकित्सा परिषद (एमसीआइ) को निलंबित कर बीओजी का गठन किया था। इस विधेयक के कानून बन जाने के बाद चिकित्सा शिक्षा क्षेत्र में इंस्पेक्टर राज खत्म हो जाएगा।
लोकसभा में स्वास्थ्य व परिवार कल्याण मंत्री हर्षवर्धन ने विधेयक के प्रावधानों को लेकर विपक्ष की ओर से उठाए गए मुद्दों का विस्तार से जवाब दिया। उन्होंने कहा कि एनएमसी देश में मेडिकल के छात्रों और डाक्टरों की सभी हितों का संरक्षण और संवर्धन करेगा। इससे देश के मेडिकल कॉलेजों और वहां के छात्रों की कमी दूर करने में भी सफलता मिलेगी।
 
हर्षवर्धन ने बताया कि पिछले पांच साल में सरकार के प्रयास से एमबीबीएस की लगभग 35 हजार और पीजी की 17 हजार सीटें बढ़ाई जा चुकी हैं। देश में एम्स समेत सभी मेडिकल कॉलेजों में एमबीबीएस में नामांकन सिर्फ एक परीक्षा, जिसका नाम एनआइआइटी (नेशनल एलिजिबिलिटी कम एंट्रेस टेस्ट) रखा गया है, होने से छात्रों की परेशानी कम होगी।
निजी मेडिकल कॉलेजों में 50 फीसदी सीटों को अनियंत्रित छोड़ने से मनमानी फीस वसूले जाने की आशंकाओं को खारिज करते हुए हर्षवर्धन ने कहा कि देश में एमबीबीएस की मौजूदा लगभग 80 हजार सीटों में से लगभग 60 हजार सीटों पर फीस सरकार की ओर से निर्धारित की जाएगी।
 
उन्होंने बताया कि लगभग 80 हजार सीटों में आधी सीटें सरकारी मेडिकल कॉलेजों की हैं, जिनकी फीस बहुत कम होती है। वहीं बाकी बची लगभग 40 हजार सीटों में से 20 हजार के लिए फीस निर्धारण सरकार करेगी। यही नहीं, यदि राज्य सरकारें चाहें तो निजी मेडिकल कॉलेजों के लिए छोड़ी गई 50 फीसदी सीटों पर फीस को नियंत्रित कर सकती हैं और इसके लिए मेडिकल कॉलेजों के साथ समझौता कर सकती हैं।
 
एमबीबीएस छात्रों को देनी होगी एक्जिट परीक्षा
एमबीबीएस पास करने के बाद छात्रों को मेडिकल की प्रैक्टिस करने के लिए एक्जिट परीक्षा देनी होगी। इस एक्जिट परीक्षा को लेकर सांसदों के गलतफहमी को दूर करते हुए हर्षवर्धन ने कहा कि इस परीक्षा के बाद डाक्टरों को कोई परीक्षा नहीं देनी होगी। इसमें आने वाले अंक के आधार पर उनका नामांकन पीजी में हो जाएगा। पीजी के लिए अलग से होने वाली एनआइआइटी की परीक्षा स्वत: खत्म हो जाएगी।
 
एक्जिट परीक्षा में पास होने वाले छात्रों को प्रैक्टिस करने का अधिकार मिल जाएगा। इसमें फेल होने वाले छात्रों को अगले साल दोबारा यह परीक्षा देने का मौका होगा। यही नहीं, परीक्षा में अपना रैंक सुधारने की इच्छा रखने वाले छात्र भी दोबारा यह परीक्षा दे सकते हैं। विदेशों से पढ़ाई कर आने वाले एमबीबीएस के छात्रों को भी भारत में प्रैक्टिस करने के लिए अलग से परीक्षा नहीं देनी होगी, बल्कि एक्जिट परीक्षा को ही क्लीयर करना होगा।
विपक्ष ने विधेयक को गरीब विरोधी बताया
 
लोकसभा में कांग्रेस दल के नेता अधीर रंजन चौधरी ने विधेयक को गरीब विरोधी बताते हुए इसे स्थायी समिति में भेजने की मांग की, जिसे हर्षवर्धन ने ठुकरा दिया। हर्षवर्धन का कहना था कि 2017 में पेश होने के बाद यह विधेयक दो बार संसदीय समिति में जा चुका है। यही नहीं मौजूदा विधेयक में संसदीय समिति के अधिकांश सुझावों को भी शामिल किया जा चुका है।
विपक्ष की ओर से विधेयक में कई संशोधन प्रस्तावित किए गए, लेकिन वे स्वीकृत नहीं हो सके। प्रस्तावित संशोधनों के अमान्य किये जाने से नाराज कांग्रेस सांसदों ने सदन से वाकआउट किया।
 
कोट
'एनएमसी विधेयक दूरदर्शी कदम है और इतिहास में यह मोदी सरकार के सबसे बड़े सुधार के रूप में दर्ज होगा- हर्षवर्धन, केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री।'
 
  •  जानिए, कैसे ये बिल प्राइवेट मेडिकल कॉलेजों में सीट के बदले फीस उगाही पर लगाम लगा सकता है. फिलहाल लोकसभा में यह बिल पास हो चुका है. अब राज्यसभा में पारित होने के बाद ये कानून की शक्ल ले लेगा. जानें, क्या है ये बिल, क्यों चिकित्सा क्षेत्र से बिल को लेकर आ रही हैं मिली-जुली प्रतिक्रियाएं.
     
  • नेशनल मेडिकल कमीशन बिल: जानें, कैसे होनहार बच्चे कर सकेंगे MBBS
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    बिल को तमाम विरोधों के बीच इसे चिकित्सा क्षेत्र में बड़ा परिवर्तन लाने वाला भी बताया जा रहा है. बिल की सबसे बड़ी खासियत है कि इससे निजी मेडिकल कॉलेजों की कमाई तेजी से कम होगी. सूत्रों की मानें तो अब तक प्राइवेट मेडिकल कॉलेज मैनेजमेंट कोटे की सीटों को एक-एक करोड़ रुपये में अयोग्य छात्रों को बेच देते थे. ये कॉलेज साढ़े चार वर्षीय एमबीबीएस के लिए हर साल करीब 15 से 25 लाख रुपये तक सालाना की फीस वसूलते थे. 
     
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    सरकार के जिम्मे होंगी 20 हजार सीटें 

    देश में मेडिकल की करीब 80 हजार सीटें हैं. इसमें आधी सीटें सरकारी कॉलेजों के पास तो आधी निजी मेडिकल कॉलेजों के पास हैं. मगर एनएमसी बिल के कानून बनने पर निजी कॉलेजों के अधीन आने वाली 40 हजार सीटों का 50 प्रतिशत यानी 20 हजार सीटों की फीस सरकार निर्धारित करेगी. इस तरह सरकार के पास 60 हजार सीटों के निर्धारण का अधिकार होगा.
     
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    ...ताकि मेडिकल कॉलेज बंद न हों 

    20 हजार सीटों पर ही निजी मेडिकल कॉलेज अपने स्तर से प्रवेश ले पाएंगे. 20 हजार सीटें इसलिए सरकार ने छोड़ीं हैं, ताकि निजी मेडिकल कॉलेज घाटे के कारण बंद न हो जाएं. अगर ये कॉलेज बंद हो जाएंगे तो फिर डॉक्टरों की कमी और बढ़ जाएगी. पहले 40 हजार सीटों पर कॉलेज डोनेशन लेकर दाखिले करते थे. 
     
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    उत्तर प्रदेश चिकित्सा आयोग के सदस्य डॉ. प्रमेंद्र माहेश्वरी ने AajTak.in से बातचीत में कहा कि देश वर्तमान में ट्रांसफॉर्मेशन के दौर से गुजर रहा है. अब मेडिकल सेक्टर भी बड़े बदलाव से अछूता नहीं रहेगा. अब तक पैसे के दम पर भी तमाम अयोग्य छात्र डॉक्टर बनते रहे हैं,
     
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    अब अखिल भारतीय स्तर पर आयोजित नीट पास करने के बाद ही किसी का दाखिला होगा. निजी मेडिकल कॉलेजों में दाखिले के लिए भी नीट देना जरूरी है. सिर्फ डोनेशन के दम पर ही अब डॉक्टर नहीं बन सकेंगे. सरकार की कोशिश है कि योग्य छात्रों को ज्यादा सीटें मिलें. बता दें, हाल ही में जारी मीडिया रिपोर्टस के अनुसार कुछ मेडिकल कॉलेजों ने नीट में जीरो नंबर होने पर भी अपने यहां एडमिशन दिए थे.
     
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    डॉ. माहेश्वरी ने कहा कि बिल में कम्युनिटी हेल्थ प्रोवाइडर्स का प्रावधान है. प्रशिक्षित चिकित्सकों को सरकार के इस कदम को सकारात्मक रूप से लेने की जरूरत है. सरकार चाहती है कि गांव-गांव स्वास्थ्य सुविधाओं का विकास हो. झोलाछाप चिकित्सक जानकारी के अभाव में मरीजों की जान से खिलवाड़ करते हैं. इस समस्या से निजात पाने के लिए सरकार ऐसे प्रशिक्षित लोगों का नेटवर्क तैयार करना चाहती है जो प्राथमिक उपचार में ट्रेंड हों. कम से कम इतने ट्रेंड तो हों कि अस्पताल पहुंचने से पहले तक गांव-कस्बे के लोगों को वे प्राथमिक उपचार दे सकें. रजिस्टर्ड चिकित्सक और अस्पताल के अंडर में उचित ट्रेनिंग से हेल्थ प्रोवाइडर्स के जरिए सरकार झोलाछाप चिकित्सकों की समस्या खत्म करना चाहती है.
     
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  • एमबीबीएस की पढ़ाई हल्के में लेना पड़ेगा भारी

    अब तक तमाम मेडिकल छात्र एमबीबीएस की पढ़ाई काफी हल्के में लेते थे. वजह कि उनका निशाना पीजी में दाखिले पर होता था. वे एमबीबीएस के दौरान ही पीजी की तैयारी करते थे. जिससे एमबीबीएस की न तो ठीक से पढ़ाई करते थे और न ही ठीक से इंटर्नशिप. इस बिल में उनके लिए भी व्यवस्था की गई है.
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    अब एग्जिट एग्जाम भी होगा 

    सरकार अब MBBS के बाद एग्जिट एग्जाम की व्यवस्था होगी. यह एग्जाम कॉलेज लेवल पर नहीं बल्कि ऑल इंडिया लेवल पर होगा. डॉ. प्रमेंद्र माहेश्वरी का कहना है कि बिल में एग्जिट एग्जाम का प्रावधान उचित कदम है. यह एक प्रकार से इलाज के  लिए लाइसेंस प्रदान करने वाली परीक्षा होगी. एग्जाम जरूरी होने से अब मेडिकल छात्र एमबीबीएस की ठीक से पढ़ाई करेंगे.